Achyutam Yadav Ghazals
(1)
नाराज़गी किसी से जता कर नहीं गया
वो अपनी बे-दिली भी दिखा कर नहीं गया
बरसात से डरा हुआ वो तन्हा आदमी
काग़ज़ की कोई कश्ती बना कर नहीं गया
ये कैसे मानूँ मैं कि वो आएगा लौट कर
कोई दिलासा भी तो दिला कर नहीं गया
उस जाने वाले से ये गिला ही रहा कि वो
जाते हुए गले से लगा कर नहीं गया
उसके फ़िराक़ से फ़ज़ा भी ग़मज़दा हुई
तूफ़ाँ भी कोई पत्ता हिला कर नहीं गया
शायद मेरा भी दिल नहीं था एक होने का
वो भी कोई बहाना बना कर नहीं गया
‘अबतर’ थे मेरे पास सितारे कई मगर
मैं आसमान सर पे उठा कर नहीं गया
(2)
मैं हूँ ‘आबिद तो ने’मत से तुम
और मिले भी हो मन्नत से तुम
दिल पे ख़ुद्दारी का ताला है
तोड़ के देखो दौलत से तुम!
बचना है मुझको तन्हाई से
हाथ थामो मोहब्बत से तुम
बुज़दिली खा गई हर हुनर
काम लेते थे हिम्मत से तुम
होगे गर मेरी क़िस्मत में तो
होगे आधा ज़रूरत से तुम
कितना मसरूफ़ हूँ इन दिनों
देखना मुझको फ़ुर्सत से तुम
क्या पता किस तरफ़ जाते हो
अब नहीं दिखते हो छत से तुम
क्या है ‘अबतर’ में इतना अलग
देखते हो जो हैरत से तुम
(3)
इतनी बरकत मुझे अता न करो
करना भी हो तो बारहा न करो
वो तुम्हारे ही राह की हों तो ठीक
हर मुसीबत का सामना न करो
तोड़ कर देखना जो कुछ भी मिले
रिश्तों में ऐसा बचपना न करो
अपनी मंज़िल पे मैं पहुँचता नहीं
मेरे नक़्श-ए-पा पे चला न करो
हिज्र से मुझको मर ही जाने दो
मेरे इस दर्द की दवा न करो
कुछ तो ख़ुद्दारी है अँधेरों में
रौशनी भीक में लिया न करो
(4)
हज़ारों तारे उसे आँख भर के देखते हैं
तमाम झरने जबल से उतर के देखते हैं
हमारे होंठ लरज़ते हैं सामने उनके
सो क्यूँ न नज़रों से ही बात कर के देखते हैं
अबस है सामने उसके सभी की आराइश
अजब हैं आप कि फिर भी सँवर के देखते हैं
हैं उसकी रत्ब सी आँखें इनायत-ए-यज़्दाँ
ये झील क्यों न कभी पार कर के देखते हैं
है उसका चेहरा अगर फूल की तरह नाज़ुक
तो क्यों न तितलियों जैसा ठहर के देखते हैं
ख़बर है बे-रुख़ी की उसकी हम को भी ‘अबतर’
चलो ये राह-ए-ख़लिश से गुज़र के देखते हैं
(5)
या तो रुक जाओ कि शायद मेरा यार आ जाए
घोंप दो वरना ये ख़ंजर कि क़रार आ जाए
क्या ख़बर तेरे तबस्सुम की कुशादा रुत में
मेरे मायूस लबों पे भी बहार आ जाए
क्या ये तकलीफ़ ही हम-राह रहेगी मेरी
काश पैरों तले इसके कोई ख़ार आ जाए
ज़ेब-ओ-ज़ीनत न कर इतनी कि कहीं लेके फ़ुगाँ
कल को दर पे तिरे फूलों की क़तार आ जाए
इसलिए की है मोहब्बत की ज़मीं तर उसने
ख़ुश्क हों जैसे ही आँसू तो दरार आ जाए
(6)
ये कौन कहता है मुझे हसरत है मौत की
पर साँस लेते रहना भी ख़िदमत है मौत की
कोई न होश-मंद रहे देखकर इसे
महबूब से भी ख़ूब-रू सूरत है मौत की
हम पारसाओं को भी नहीं मिलता है बहिश्त
क्या इतनी बे-शुऊर अदालत है मौत की
इसके फ़िराक़ से ही बढ़ेगी मिरी हयात
यानी ये बरहमी भी मोहब्बत है मौत की
हाथों में आए जो भी है वो ज़िंदगी की देन
हाथों से जो भी जाए वो क़ीमत है मौत की
(7)
गर यही होगा रवैया तो गए तुम काम से
तुमको तो मेहनत भी करनी है वो भी आराम से
बे-सर-ओ-पा होगा जलसा इब्तिदाई का वहाँ
जाना जाता है जहाँ हर आदमी अंजाम से
जानता हूँ आख़िरश जीतोगे तो तुम ही मगर
दूर रखना है तुम्हें कुछ देर इस इनआम से
तुम ही हो बाद-ए-सबा तुम ही बहारों का निशाँ
कितने गुल डरते हैं मेरी जाँ तुम्हारे नाम से
उन उजालों से तुम्हें क्या ख़ाक हिम्मत आएगी
ख़ौफ़ खाते हैं जो ख़ुद ही आने वाली शाम से
(8)
जो कुछ मिला मुझको मेरी हाजत से भी आधा मिला
हालाॅंकि ख़ुश हूँ जो मिला उम्मीद से ज़्यादा मिला
सब क़ैद रहना चाहते हैं इश्क़ में वरना मियाँ
पहले नहीं हैं आप जिसको कोई दरवाज़ा मिला
बालीदगी का क़त्ल करके फ़ैसले लेता है वो
तुम नाम की रानी हो तुमको नाम का राजा मिला
मेरे अनोखे इस्तिआरे देखना फिर बोलना
और सबका क्या है, चाँद बोला और छुटकारा मिला
'अबतर' ख़ुद अपने आप को मैंने न जाने खोया कब
इक आदमी तो मुझसे भी ज़्यादा मेरे जैसा मिला
(9)
वो भी राज़ी न था अंजाम पे आने के लिए
मैंने भी टोका ही था बात बढ़ाने के लिए
मैं निभाने को निभा सकता हूँ हर इक का साथ
साथ में कोई हो तो साथ निभाने के लिए
मुझको क्यों लगता है ऐसा कहीं देखा है तुम्हें
इक जनम कम पड़ा क्या तुमको भुलाने के लिए
रूह ने ख़ुदकुशी कर ली है मेरे अंदर ही
अश्क मजबूर हैं अब लाश उठाने के लिए
ख़ौफ़ वाजिब है परिंदे का दिखे जब लोहा
काम आता है यही पिंजरा बनाने के लिए
रोक लेंगे मुझे ऐसा लगा उनको लेकिन
काँटे कम पड़ गए रस्तों पे बिछाने के लिए
(10)
किस आरज़ू को भला आसरा दिया जाए
किसे ख़ुद अपने ही दिल में डुबा दिया जाए
हवा से हार गया जंग जो चराग़-ए-गोर
बग़ल में उसकी भी तुर्बत बना दिया जाए
अगर सँवरना लिखा है बदन के हिस्से में
तो क्यों न रूह को भी आइना दिया जाए
या नर्म-दिल हैं बहुत से बशर या हैं नादान
अब ऐसे मौक़े पे किसको दग़ा दिया जाए
शिकस्त खा रहे हैं दिल की सुनते-सुनते हम
सलाह-कार हमें अब नया दिया जाए
जो क़र्ज़ मानके हर चीज़ लौटा दे 'अबतर'
उस एक शख़्स को तोहफ़े में क्या दिया जाए
Achyutam Yadav Sher
(1)
ढूँढता फिर रहा है ज़हर मिरी ख़ातिर वो
मेरे मरने के लिए काफ़ी है ये सुनना ही
(2)
कह रहा था मैं नहीं है दुख किसी भी बात का
और छलक के गिर पड़ा इक आँसू पिछली रात का
(3)
इतनी सख़्त-दिली से छोड़ा है उसने 'अबतर'
डर लगता है अपनाने से अब तन्हाई भी
(4)
ज़िंदगी का हर वरक़ बा-शौक़ पढ़िए
ये किताब इक रोज़ लौटानी भी तो है
(5)
मुस्कुराने से ग़म हुए थे अयाँ
ऐसे रोना है अब कि शाद लगूँ
Achyutam Yadav Nazm
(1)
"वो चेहरा"
ग़मज़दा शब में वो चेहरा
मेरे दिल के कहकशाँ में
यूँ चमकता है किसी तारे की मानिंद
मेरे चेहरे पे चमक है जिस ज़िया से
चोट तारीकी को करती है मुसलसल
ऐसी तारीकी कि जिस में
दफ़्न है मेरी तजस्सुस
कोई चेहरा देखने की
कोई अपना ढूँढ़ने की
पर ये तारा दस्तरस में ही नहीं है
रौशनी से इसकी कब तक और बहलूँ
फिर सवेरा होगा और फिर
अपनी हसरत मारकर मैं
जीऊँगा घुट-घुट के फिर से
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